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    سوال نمبر: 175707

    عنوان: शरई के हिसाब से या फिर पानी पाक रहने के ऐतबार से हौज़ की तफसील चाहिए जिसमे हम वजू कर सकते हे

    سوال: मैं एक इंजीनियर हुं, बुरहानपुर शहर मध्य प्रदेश में एक मस्जिद का प्लान कर रहा हुं। मैंने एक प्लान में हौज़ बनाया हुं जगह कम होने की वजह से मैं उसकी साइज़ ज्यादा से ज्यादा 5 फिट 9 इंच चौड़ा 21 फिट लम्बा यानि चटाई माप 120.75 स्कीअर फिट होता है। अब मुझे शरई एतबार से इसकी गहराई कितनी लम्बी लेनी पड़ेगी ताकि इसका पानी पाक कहने के लायक हो.. मैं इसे 3 फिट गहरा लेने के फैसले में था, या फिर क्या हम इसे बिना शरई के भी बना सकते हैं और फिर उसका मेंटेनन्स कैसा रहेगा, लम्बाई चौड़ाई में किसी भी तरह से बढ़ा नहीं सकता जगह के ऐतबार से, ऐसा कुछ रास्ता बताऐं ताकि हम इसमे वजू भी बना सकें और मेंटेनन्स भी कम हो, मसले का हल निकले बराए मेहरबानी ।

    جواب نمبر: 17570714-Sep-2020 : تاریخ اشاعت

    بسم الله الرحمن الرحيم

    Fatwa ID: 478-87T/L=06/1441

    हौज़ की कुल लम्बाई व चौड़ाई 10X10 ज़ेराअ हो तो वो बड़ा हौज़ कहलाए गा। एक ज़ेराअ डेढ़ फिट (18/इंच) का होता है, इस लेह़ाज़ से जो हौज़ 225 फिट मुरब्बा (वर्ग) का हो वो शरई हौज़ और बड़ा हौज़ शुमार होगा, अगर लम्बाई ज़्यादा और चौड़ाई कम हो लेकिन मजमूई एतेबार से उस मिक़दार को पहुंच जाए तो वो भी बड़ा हौज़ है, और गहराई इतनी काफी है कि चुल्लू से पानी लिया जाए तो ज़मीन दिखाई ना दे। वाज़ेह रहे कि हौज़ बड़ा हो या छोटा उसमें वुज़ू करना जाइज़ है; अलबत्ता छोटा हौज़ नेजासत के गिरने से नापाक हो जाता है और बड़ा हौज़ नापाक नहीं होता जब तक पानी के तीनों औसाफ (रंग, बू, मज़ा) में से कोई वस्फ बदल ना जाए।

    في النهر: وأنت خبیر بأن اعتبار العشر أضبط ولا سیما في حق من لا رأي له من العوام، فلذا أفتی به المتأخرون الأعلام أي: في المربع بأربعین وفي المدور بستة وثلاثین وفي المثلث من کل جانب خمسة عشر وربعا وخمساً بذراع الکرباس، ولوله طول لا عرض لکنه یبلغ عشراً في عشر جاز تیسیراً. (الدر المختار مع رد المحتار، کتاب الطهارة، باب المیاہ، 1: 341-343، ط: مکتبة زکریا دیوبند) وفي الهدایة: المعتبر فی العمق أن یکون بحال لا ینحسر بالاغتراف هو الصحیح. (الهدایة: 1/37) (وبتغیر أحد أوصافه) من لون أو طعم أو ریح (ینجس) الکثیر ولو جاریا إجماعا. أما القلیل فینجس وإن لم یتغیر. (الدر المختار مع رد المحتار: 1/296، ط: زکریا دیوبند)


    واللہ تعالیٰ اعلم


    دارالافتاء،
    دارالعلوم دیوبند